‘द लैंसेट’ में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को लेकर छपी स्टडी पर उठ रहे सवाल, 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने कहा- डब्ल्यूएचओ हकीकत जांचे

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  • वैज्ञनिक स्टडी में शामिल 6 महाद्वीपों के 600 से ज्यादा अस्पतालों का नाम बताए जाने की मांग कर रहे
  • डाटाबेस कंपनी सर्जिस्फीयर ने कहा- सोर्स पर नियंत्रण नहीं, हमने सिर्फ उपलब्ध डेटा को रिपोर्ट किया

दैनिक भास्कर

Jun 03, 2020, 01:52 PM IST

रॉनी कैरिन रैबिन. बीते हफ्ते मलेरिया की दवा क्लोरोक्वीन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को लेकर प्रकाशित हुई एक स्टडी पर सवाल उठ रहे हैं। इस स्टडी में कहा गया है कि कोविड 19 से जूझ रहे मरीजों के इलाज में यह दवाइयां मदद नहीं कर रही हैं। साथ ही इससे ह्रदय संबंधित रोग और मौत की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। 100 से ज्यादा साइंटिस्ट और क्लीनिशियन्स ने स्टडी की प्रमाणिकता के लिए डब्ल्युएचओ और दूसरी संस्थाओं से जांच कराए जाने की मांग की है। एक खुले पत्र में वैज्ञानिकों ने द लैंसेट के संपादक रिचर्ड हॉर्टन और दूसरे लेखकों से डेटा मुहैया कराने के लिए कहा है। 

काफी सुर्खियों में है क्लोरोक्वीन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन

  • क्लोरोक्वीन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन काफी समय से सुर्खियां में बनी हुई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी लगातार इसका प्रचार कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने बताया कि कोरोनावायरस संक्रमण से बचने के लिए वे लगातार इसका सेवन भी कर रहे हैं।
  •  22 मई को प्रकाशित हुए द लैंसेट पेपर में अस्पताल में भर्ती हजारों मरीज का डाटा शामिल था। इसके बाद इन पेपर्स की महज पांच हफ्तों में समीक्षा की गई, आमतौर पर यह प्रक्रिया लंबा वक्त लेती है। इसके अलावा एक्सपर्ट्स ने स्टडी के तरीके और अस्पतालों के नाम न बताए जाने की आलोचना की है। शिकागो स्थित सर्जिस्फीयर कंपनी इस डाटा की मालिक है। 
  • वैज्ञानिकों ने लिखा कि अफ्रीका का डाटा बताता है कि महाद्वीप में कोविड 19 के 25 प्रतिशत संक्रमण के मामले और मौत के 40 प्रतिशत मामले सर्जिस्फीयर संबंधित अस्पतालों में सामने आए। इन अस्पतालों में मरीजों की इलेक्ट्रॉनिक डाटा रिकॉर्डिंग की जाती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, संक्रमण के मामले और मौतों का डाटा कलेक्शन इतना संभव नजर नहीं आ रहा है। 

सरकार की रिपोर्ट्स से मेल नहीं खा रहा डाटा

  • अलोचकों की चिंता का एक और कारण था कि ऑस्ट्रेलिया में कोविड 19 का डाटा सरकार की रिपोर्ट से मेल नहीं खा रहा था। द लैंसेट की प्रवक्ता एमिली हेड ने ईमेल के जरिए बताया कि जर्नल के पास पेपर को लेकर काफी सवाल आए हैं। यह प्रश्न लेखकों को भेज दिए गए हैं।
  • एमिली ने कहा कि हम जरूरत पड़ने पर और डाटा उपलब्ध कराएंगे। लैंसेट साइंटिफिक डिबेट को प्रोत्साहित करता है और इसकी प्रतिक्रियाओं को स्टडी में लेखकों की प्रतिक्रियाओं के साथ छापा जाएगा। शनिवार को जर्नल ने स्टडी में दो सुधार किए। लेकिन यह कहा गया कि पेपर की प्राप्तियों में कोई बदलाव नहीं किए गए हैं।

6 महाद्वीपों के 671 अस्पतालों से लिया गया है डाटा

  • सर्जिस्फीयर के फाउंडर और मालिक डॉक्टर सपन एस देसाई ने कंपनी के डाटाबेस का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि कोरोनावायरस संक्रमण और मौत की आधिकारिक गिनती वास्तविक से अलग हो सकती है, जो यह परेशानी को समझा सकती है।
  • पेपर के लेखकों ने कहा कि उन्होंने 6 महाद्वीपों के 671 अस्पतालों के डाटा की जांच की है। इन अस्पतालों ने अपनी पहचान बचाते हुए 15 हजार दवाई लेने वाले और 81 हजार दवाई नहीं लेने वाले मरीजों की बारीक जानकारी साझा की थी। डॉक्टर देसाई ने कहा कि दुनिया को यह समझना होगा कि यह रजिस्ट्री आधारित डाटा होता है। इसके सोर्स पर हमारा कोई कंट्रोल नहीं होता है। हम केवल प्राप्त डाटा को रिपोर्ट कर सकते हैं। 

स्टडी पर सवाल उठाने वालों में कई बड़ी यूनिवर्सिटी शामिल

  • बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ के शोधकर्ताओं ने भी सर्जिस्फीयर के डाटाबेस पर सवाल उठाए हैं। स्टडी की आलोचना करने वालों में हार्वर्ड के टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, पैंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी, वैंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी और ड्यूक यूनिवर्सिटी समेत एकेडमिक मेडिकल सेंटर्स के क्लीनिशियन्स, शोधकर्ता, स्टेटिसटीशियन्स और एथिसिसिस्ट्स शामिल हैं। 
  • ड्यूक क्लीनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉक्टर एड्रियन हर्नांडेज ने कहा कि पेपर में कई विसंगतियां हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि यहां 600 से ज्यादा अस्पतालों का बड़ा डाटाबेस है और कोई इनके अस्तित्व के बारे में नहीं जानता। 
  • ऑस्ट्रेलिया के मेलबॉर्न स्थित मॉनेश यूनिवर्सिटी में संक्रामक रोगों के प्रोफेसर एलन चेंग ने ईमेल के जरिए बताया कि इस डाटाबेस में शामिल एक-एक अस्पताल की पहचान होनी चाहिए। आदर्श रूप से डाटाबेस को सार्वजनिक करना चाहिए, लेकिन अगर ऐसा संभव नहीं है तो इसकी स्वतंत्र रूप से समीक्षा की जानी चाहिए।
  • इस महीने द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में छपी स्टडी ऑफ कोरोनावायरस पेशेंट्स भी सर्जिस्फीयर के डाटा पर आधारित थी। द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन की प्रवक्ता जैनिफर जीस ने बताया कि जर्नल उठाए गए प्रश्नों से अवगत था और इन्हें देखा जा रहा था।
  • हार्वर्ड के प्रोफेसर डॉक्टर मंदीप आर मेहरा ने शुक्रवार को बयान जारी कर कहा कि, पेपर के लेखकों ने अस्पताल में भर्ती कोविड 19 के मरीजों की देखभाल के बारे में सूचित करने के लिए सर्जिस्फीयर से प्राप्त डाटा का लाभ उठाया है। क्योंकि क्लीनिकल ट्रायल्स के परिणाम कुछ समय के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। 

डब्ल्युएचओ ने सस्पेंड कर दिए थे क्लीनिकल ट्रायल्स
इससे पहले कुछ स्टडीज ने क्लोरोक्वीन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन से होने वाले नुकसान के बारे में बता चुकी हैं। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन भी इसे लेकर चेतावनी जारी कर चुका है। लैंसेट पेपर के प्राकाशित होने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन और दूसरी संगठनों ने इस दवा के क्लीनिकल ट्रायल रोक दिए थे।